Supreme Court SIR Hearing: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के बीच चल रही कानूनी प्रक्रिया के बीच एक अहम अपडेट सामने आया है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट किया है कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग ने यह भी कहा कि SIR से जुड़े फैसले किसी एक अधिकारी ने अकेले नहीं, बल्कि आयोग के सदस्यों की सहमति से लिए हैं।
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चुनाव आयोग का यह जवाब ऐसे समय आया है, जब SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में नाम जोड़ने के नियमों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को लेकर सवाल उठाए गए हैं। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई होनी है।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?
चुनाव आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में फॉर्म-6 में बदलाव किए जाने के आरोपों को खारिज किया है। आयोग के मुताबिक, फॉर्म-6 में कानूनी संशोधन नहीं किया गया है। SIR प्रक्रिया के दौरान इस्तेमाल किया जा रहा अतिरिक्त घोषणा-पत्र (Declaration Form) एक अलग दस्तावेज है।
आयोग ने यह भी कहा कि निर्धारित फॉर्म में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। इसलिए SIR से संबंधित आदेशों के माध्यम से फॉर्म-6 में बदलाव किए जाने का आरोप सही नहीं है।
हालांकि, आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में अतिरिक्त घोषणा-पत्र को जिस तरह प्रदर्शित किया गया था, उससे यह भ्रम पैदा हो सकता था कि फॉर्म-6 में संशोधन किया गया है। इस समस्या को दूर करने के लिए 21 अक्टूबर 2026 से ऑनलाइन आवेदन और घोषणा-पत्र को अलग-अलग हिस्सों में रखने की व्यवस्था की गई।
क्या है SIR और फॉर्म-6 का पूरा विवाद?
SIR का पूरा नाम स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन है। हिंदी में इसे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कहा जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की जांच करना और पात्र मतदाताओं से संबंधित विवरणों को अपडेट करना है।
वहीं, फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। इसमें पहली बार मतदाता बनने वाले पात्र नागरिक भी शामिल हैं।
विवाद उस समय बढ़ा, जब SIR से जुड़ी आवेदन प्रक्रिया में अतिरिक्त घोषणा-पत्र को शामिल किए जाने पर सवाल उठे। इस घोषणा-पत्र के माध्यम से आवेदकों से अपने या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम पुराने मतदाता रिकॉर्ड में होने से संबंधित जानकारी मांगी जा सकती है।
इस व्यवस्था को लेकर सवाल उठाया गया कि क्या अतिरिक्त जानकारी मांगने की प्रक्रिया निर्धारित वैधानिक फॉर्म में बदलाव के समान है। याचिकाकर्ताओं ने प्रक्रिया की वैधता और चुनाव आयोग के फैसले लेने के तरीके पर भी आपत्ति जताई।
चुनाव आयोग का कहना है कि घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज है और इसका उद्देश्य आवेदकों की पात्रता की जांच करने में मदद करना है। आयोग के अनुसार, ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है, ताकि फॉर्म-6 और घोषणा-पत्र के बीच अंतर स्पष्ट रहे।
चुनाव आयोग ने फैसलों पर क्या सफाई दी?
फॉर्म-6 के अलावा चुनाव आयोग ने अपने कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी पक्ष रखा है। आयोग ने कहा कि SIR से जुड़े तीन प्रमुख आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को आयोग के सर्वसम्मत फैसलों के आधार पर जारी किए गए थे।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अन्य दो निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना कुछ अहम फैसले लिए। इन आरोपों के जवाब में आयोग ने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया संस्थागत है और आयोग के सदस्य इसमें शामिल होते हैं।
हलफनामे के मुताबिक, संबंधित फाइलें पहले एक निर्वाचन आयुक्त, फिर दूसरे निर्वाचन आयुक्त और उसके बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास जाती हैं। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी मंजूरी ली जा सकती है और उसे बाद में आधिकारिक फाइल में दर्ज किया जाता है।
आयोग ने अपने हलफनामे को भी तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से मंजूर किए जाने की बात कही है। इस तरह चुनाव आयोग ने अदालत के सामने अपनी निर्णय प्रक्रिया को सामूहिक और नियमों के अनुरूप बताया है।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?
इस मामले में याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कामकाज और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया कि आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं किया गया। SIR से जुड़े फैसलों, मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया और आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर भी आपत्तियां उठाई गईं।
याचिकाकर्ता की ओर से यह मांग की गई है कि आयोग के फैसलों की वैधता की जांच की जाए और यदि निर्णय कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं पाए जाते हैं, तो उचित कार्रवाई की जाए।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए याचिका के आधार पर भी सवाल उठाए हैं। आयोग का कहना है कि याचिका मुख्य रूप से एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है और इसमें लगाए गए आरोप स्वीकार करने योग्य नहीं हैं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये याचिकाकर्ता के आरोप और चुनाव आयोग के जवाब हैं। मामले में अंतिम कानूनी निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आदेशों के आधार पर ही निकलेगा।
मतदाताओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
SIR और फॉर्म-6 से जुड़ा विवाद सीधे मतदाता पंजीकरण और मतदाता सूची की प्रक्रिया से संबंधित है। इसलिए इसका असर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जो पहली बार वोटर बनने जा रहे हैं या मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाना चाहते हैं।
मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए पात्र नागरिकों को निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को अपने आवेदन, दस्तावेजों या नाम से संबंधित समस्या है, तो उसे संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी या चुनाव आयोग के आधिकारिक माध्यमों से जानकारी लेनी चाहिए।
सिर्फ इस विवाद के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सभी आवेदकों के लिए नियम बदल गए हैं। आवेदन करते समय लागू आधिकारिक निर्देशों और निर्धारित फॉर्म का ही पालन करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में कल क्या होगा?
इस मामले में अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है। अदालत चुनाव आयोग के जवाब और याचिका में उठाए गए सवालों पर विचार करेगी।
सुनवाई के दौरान फॉर्म-6, अतिरिक्त घोषणा-पत्र और आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण रह सकते हैं। हालांकि, अदालत क्या निर्देश देगी या मामले में आगे क्या फैसला होगा, यह सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा।
इसलिए फिलहाल चुनाव आयोग के हलफनामे को उसका आधिकारिक पक्ष माना जाना चाहिए, न कि मामले पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला।
नोट- SIR विवाद पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करते हुए कहा है कि फॉर्म-6 में कोई कानूनी संशोधन नहीं किया गया और SIR से जुड़े प्रमुख फैसले आयोग के सदस्यों की सहमति से लिए गए थे। आयोग ने ऑनलाइन घोषणा-पत्र को लेकर भ्रम की संभावना स्वीकार करते हुए उसे आवेदन से अलग करने की व्यवस्था लागू करने की जानकारी भी दी है।
अब 27 अक्टूबर 2026 को होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी। अदालत की आगे की टिप्पणी और आदेश से यह स्पष्ट होगा कि फॉर्म-6 तथा SIR प्रक्रिया से जुड़े विवाद में अगला कदम क्या होगा।

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