Plastic Notes in India: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) देश की मुद्रा व्यवस्था को एक नए युग में ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार है। भारतीय अर्थव्यवस्था और बैंकिंग क्षेत्र में लंबे समय से चर्चा में रहा ‘प्लास्टिक नोट’ (Polymer Banknotes) का विचार अब हकीकत बनने जा रहा है। आरबीआई जल्द ही देश में पॉलीमर आधारित नोटों का पायलट टेस्ट शुरू करने वाला है और सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो अप्रैल-मई 2027 यानी वित्तीय वर्ष 2027-28 (FY28) की शुरुआत से ये नोट आम लोगों के पर्स और जेबों में नजर आने लगेंगे। इस बड़े बदलाव की शुरुआत रिजर्व बैंक छोटे और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नोटों यानी 10 रुपये और 20 रुपये के नोटों से करने जा रहा है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आरबीआई का यह पूरा प्लान क्या है,
ये नोट कैसे होंगे और इससे आम नागरिक तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को क्या-क्या फायदे होंगे। RBI का पायलट प्रोजेक्ट और केंद्र सरकार की मंजूरी हाल ही में केंद्र सरकार ने लोकसभा में यह स्पष्ट किया कि उसने आरबीआई के पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल (Field Trial) के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हालिया मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद संवाददाताओं से बात करते हुए बताया कि बैंक भारतीय मौसम, बुनियादी ढांचे और उपयोग के तरीकों के बीच इन प्लास्टिक नोटों के प्रदर्शन की जांच करेगा।
ट्रायल का दायरा: आरबीआई लगभग 100-100 करोड़ पीस (कुल 2 अरब नोट) 10 और 20 रुपये मूल्यवर्ग के जारी करके परीक्षण करेगा।
कब से शुरू होगा चलन: अगर पायलट प्रोजेक्ट के नतीजे सकारात्मक रहे, तो नए वित्त वर्ष 2027-28 के शुरुआती महीनों (अप्रैल-मई 2027) से इन्हें आम जनता के लिए पूरी तरह से सर्कुलेशन में लाया जाएगा।
ग्लोबल टेंडर जारी: भारतीय रिजर्व बैंक की करेंसी प्रिंटिंग शाखा ‘भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड’ (BRBNMPL) ने पॉलिमर सबस्ट्रेट शीट की आपूर्ति के लिए वैश्विक कंपनियों से बोलियां (Expression of Interest) भी आमंत्रित की हैं।
छोटे नोटों (₹10 और ₹20) से ही शुरुआत क्यों?
अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि जब 100, 200 या 500 के बड़े नोट भी चलन में हैं, तो आरबीआई ने सिर्फ 10 और 20 रुपये के नोटों को ही क्यों चुना?
आरबीआई गवर्नर के अनुसार, “सर्कुलेशन वेलोसिटी” (Circulation Velocity) इसकी सबसे बड़ी वजह है। 10 और 20 रुपये के नोटों का इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी में सबसे ज्यादा होता है — चाहे सब्जी खरीदना हो, चाय-पानी का भुगतान करना हो या ऑटो-बस का किराया देना हो। अत्यधिक इस्तेमाल, मुड़ने, पानी लगने और पसीने के संपर्क में आने से ये छोटे नोट बहुत जल्दी गंदे, फटे और खराब हो जाते हैं। आरबीआई को हर साल करोड़ों की संख्या में खराब हो चुके 10 और 20 रुपये के नोट नष्ट करने पड़ते हैं और उनकी जगह नए नोट छापने पड़ते हैं, जिससे भारी लागत आती है। इसलिए, सबसे पहले छोटे नोटों को प्लास्टिक में बदलना सबसे ज्यादा व्यावहारिक और आर्थिक रूप से समझदारी भरा कदम है। प्लास्टिक (पॉलिमर) नोटों के मुख्य फायदेकागजी नोटों (जो मुख्य रूप से कॉटन/सूती धागों से बनते हैं) की तुलना में पॉलीमर नोटों के कई तकनीकी और व्यावहारिक लाभ हैं
3 से 4 गुना ज्यादा उम्र: पॉलिमर नोट कागजी नोटों की तुलना में लगभग 3 से 4 गुना अधिक टिकाऊ होते हैं। जहां 10 रुपये का कागजी नोट औसतन 1 से 2 साल ही चल पाता है, वहीं पॉलिमर नोट 5 से 7 साल तक आसानी से टिक सकता है। पानी और गंदगी से सुरक्षा: प्लास्टिक नोट पानी में भीगने से गलते नहीं हैं और न ही इनमें तेल या पसीना आसानी से समाता है। इन्हें आसानी से साफ भी किया जा सकता है।
नकल या जाली नोट बनाना नामुमकिन: पॉलिमर नोट में कई एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स जोड़े जा सकते हैं, जैसे पारदर्शी विंडोज (Transparent Windows), मैटेलिक न्यूमरल्स, शैडो इमेज और खास चुंबकीय धागे। इन्हें कॉपी करना बेहद मुश्किल होता है, जिससे नकली नोटों की समस्या पर लगाम लगेगी।
छपाई लागत में लंबी अवधि की बचत: हालांकि पॉलिमर नोट की शुरुआती छपाई लागत कॉटन पेपर से थोड़ी अधिक होती है, लेकिन लंबे समय तक चलने के कारण रिप्लेसमेंट कॉस्ट काफी कम हो जाती है, जिससे सरकार के करोड़ों रुपये बचेंगे। क्या आपके पुराने कागजी नोट बेकार हो जाएंगे? बिल्कुल नहीं! आरबीआई ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया है कि यह केवल एक चरणबद्ध प्रक्रिया (Phased Rollout) है। प्लास्टिक नोट आने का मतलब यह नहीं है कि मौजूदा कागज के 10 और 20 रुपये के नोट रातों-रात बंद या अमान्य (Demonetised) हो जाएंगे।
दोनों तरह के नोट — कागज और प्लास्टिक — बाजार में एक साथ लीगल टेंडर (Legal Tender) के रूप में चलेंगे। जैसे-जैसे पुराने कागजी नोट बैंक में वापस आएंगे, आरबीआई उन्हें धीरे-धीरे सिस्टम से हटाकर उनकी जगह नए प्लास्टिक नोट पेश करता जाएगा। दुनिया भर में प्लास्टिक नोटों का ट्रेंड भारत पहली बार यह प्रयोग करने जा रहा है, लेकिन दुनिया के 60 से अधिक देश पहले ही पॉलिमर करेंसी को सफलतापूर्वक अपना चुके हैं।
ऑस्ट्रेलिया: 1988 में सबसे पहले पॉलिमर नोट पेश करने वाला देश था। यूके (ब्रिटेन), कनाडा, न्यूजीलैंड, वियतनाम, सिंगापुर और मलेशिया जैसे देश भी अपनी मुख्य मुद्रा को पूरी तरह से या आंशिक रूप से पॉलिमर नोटों में बदल चुके हैं। इन देशों के अनुभवों से यह साबित हुआ है कि प्लास्टिक नोट न केवल लंबे समय तक चलते हैं, बल्कि एटीएम (ATM) और नोट गिनने की मशीनों में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
निष्कर्ष- अप्रैल-मई 2027 से भारत में प्लास्टिक नोटों की शुरुआत देश के बैंकिंग और करेंसी मैनेजमेंट में एक बड़ा और सकारात्मक कदम साबित होगी। 10 और 20 रुपये के नोटों से शुरू हो रहा यह ट्रायल सफल रहने पर आने वाले वर्षों में अन्य बड़े नोटों के लिए भी रास्ते खोल सकता है। आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब है — जेब में रहने वाला एक ऐसा नोट जो न पानी से गलेगा, न आसानी से फटेगा और हमेशा नए जैसा चमकता रहेगा!

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