US सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, खारिज की गर्भपात की गोलियों पर प्रतिबंध लगाने की याचिक; जानें पूरा मामला

US Supreme Court Abortion Pills Case- India News

वाशिंगटन: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गर्भपात के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली एक गोली पर प्रतिबंध लगाने की मांग को खारिज कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से कहा कि गर्भपात विरोधी समूहों और मिफेप्रिस्टोन दवा को चुनौती देने वाले डॉक्टरों के पास मामला लाने के लिए कानूनी आधार नहीं है। खास बात यह है कि अमेरिकी चुनाव में गर्भपात का अधिकार प्रमुख मुद्दों में से एक है और बाइडेन प्रशासन ने अदालत से दवा की उपलब्धता बनाए रखने का आग्रह किया था। दवा को साल 2000 में खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की ओर से मंजूरी दी गई थी।

बड़ा सियासी मुद्दा 

अमेरिका में गर्भपात को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है और यह बड़ा चुनावी मुद्दा भी बन गया है। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि गर्भपात के मामले में जो लड़ाई चल रही है वह जारी रहेगी। चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी का नेतृत्व करते हैं और उनकी पार्टी का मत गर्भपात को लेकर पूरी तरह से अलग है। ट्रंप और उनकी पार्टी गर्भपात को लेकर प्रतिबंधों का व्यापक रूप से समर्थन करती है।

किसने क्या कहा 

मिफेप्रिस्टोन मामले की सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई बेहद अहम थी क्योंकि दो वर्ष पहले न्यायालय ने गर्भपात के संवैधानिक अधिकार को रद्द कर दिया था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा, “फैसले से यह तथ्य नहीं बदलता कि प्रजनन स्वतंत्रता के लिए लड़ाई जारी है, गर्भपात की दवा पर हमले और प्रतिबंध की मांग खतरनाक एजेंडे का हिस्सा है।” प्रजनन अधिकार केंद्र की अध्यक्ष नैन्सी नॉर्थअप ने इस निर्णय पर “राहत और गुस्सा” दोनों व्यक्त किया है। नॉर्थअप ने कहा, “दुर्भाग्य से, गर्भपात की गोलियों पर हमले यहीं नहीं रुकेंगे, अंत में, यह निर्णय गर्भपात के लिए ‘जीत’ नहीं है – यह केवल यथास्थिति को बनाए रखता है, जो एक गंभीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा 

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ब्रेट कवानौघ ने कहा, “हम मानते हैं कि कई नागरिकों, जिनमें वादी डॉक्टर भी शामिल हैं, को दूसरों द्वारा मिफेप्रिस्टोन के प्रयोग और गर्भपात कराने के बारे में गंभीर चिंताएं और आपत्तियां हैं।”  कवानौघ ने कहा, “लेकिन नागरिकों और डॉक्टरों को सिर्फ इसलिए मुकदमा करने का अधिकार नहीं है क्योंकि दूसरों को कुछ गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति है।”  उन्होंने कहा कि वादी “विनियामक प्रक्रिया में राष्ट्रपति और FDA के समक्ष या विधायी प्रक्रिया में कांग्रेस और राष्ट्रपति के समक्ष अपनी चिंताएं और आपत्तियां प्रस्तुत कर सकते हैं।”

विरोध में तर्क 

कई दल या संगठन अमेरिका में गर्भपात की दवा मिफेप्रिस्टोन तक पहुंच को प्रतिबंधित करने की मांग कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह असुरक्षित है और डॉक्टरों को इसके बाद की जटिलताओं से पीड़ित रोगियों का इलाज करना आसान नहीं होता है। इससे पहले टेक्सास में जिला न्यायालय के न्यायाधीश ने पिछले वर्ष एक आदेश जारी किया था जिसके तहत मिफेप्रिस्टोन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। न्यायालय ने गर्भावस्था के 10 सप्ताह के दौरान मिफेप्रिस्टोन के उपयोग की अवधि को घटाकर सात सप्ताह कर दिया था, डाक द्वारा इसकी आपूर्ति पर रोक लगा दी था तथा यह अनिवार्य कर दिया था कि गोली डॉक्टर द्वारा निर्धारित और दी जानी चाहिए।

हटाए गए प्रतिबंध

अब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद मिफेप्रिस्टोन के उपयोग को लेकर ये प्रतिबंध हटा लिए गए हैं। गुट्टमाकर इंस्टीट्यूट के अनुसार, पिछले वर्ष देश में हुए कुल गर्भपात में दवा आधारित गर्भपात 63 प्रतिशत था, जो 2020 में 53 प्रतिशत था। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि अधिकांश अमेरिकी सुरक्षित गर्भपात तक पहुंच जारी रखने के पक्ष में हैं, जबकि रूढ़िवादी समूह इस प्रक्रिया को सीमित करने या इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने पर जोर दे रहे हैं।

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